, संस्कृत के विद्वान पद्मश्री से सम्मानित प्रोफ़ेसर वागीश शास्त्री, ने ली अंतिम सांस लंबे समय से चल रहे थे बीमार , संस्कृत जगत में छाया शोक

वाराणसी। संस्कृत के विद्वान पद्मश्री सम्मानित महामहोपाध्याय प्रो भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी (वागीश शास्त्री) का बुधवार रात इलाज के दौरान 88 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। प्रो वागीश शास्त्री लंबे समय से बीमार चल रहे थे। हालत गंभीर होने पर उन्हें 3 मई को निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। प्रो शास्त्री की अंत्येष्टि गुरुवार को हरिश्चंद्र घाट पर की जाएगी।

प्रो वागीश शास्त्री संस्कृत, व्याकरणविद, भाषाविद, तंत्र और योग के ज्ञाता थे। 2018 में भारत सरकार ने उन्हें साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में पद्मश्री से सम्मानित किया था। प्रो शास्त्री के निधन की सूचना मिलते ही संस्कृत जगत में शोक की लहर दौड़ गई। प्रो वागीश शास्त्री को 1982 में काशी पंडित परिषद की ओर से महामहोपाध्याय की पदवी दी गई थी।

प्रो वागीश की उपलब्धियां-
2014 में प्रदेश सरकार की ओर से यशभारती सम्मान दिया गया था। 2017 में दिल्ली संस्कृत अकादमी ने महर्षि वेद व्यास सम्मान प्रदान किया था। 1993 में उन्हें अमेरिका ने सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट गोल्ड ऑफ ऑनर से सम्मानित किया था। उन्हें 2013 में संस्कृत साहित्य में योगदान के लिए राष्ट्रपति के हाथों सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट प्रदान किया गया। राजस्थान संस्कृत अकादमी की ओर से बाणभट्ट पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

प्रो शास्त्री का जन्म 24 जुलाई 1934 में मध्यप्रदेश के सागर जनपद में हुआ था। 1959 में वाराणसी के टीकामणि संस्कृत महाविद्यालय में संस्कृत प्राध्यापक के रुप में अध्यापकीय जीवन में कदम रखा था। इसके बाद 1970 में सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में अनुसंधान संस्थान के निदेशक व प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुए।

200 से ज्यादा पांडुलिपियों का किया था संपादन
प्रो शास्त्री ने 19 साल की उम्र में निबंध लिखना शुरु कर दिया था। उन्होंने 40 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं और 200 से ज्यादा पांडुलिपियों का संपादन किया। वे पांचवी विश्व संस्कृत सम्मेलन में एक खंड के सचिव अध्यक्ष रहे। सरस्वती सुषमा नामक पत्रिका का लगभग 30 साल तक संपादन किया था।

दुनिया भर में ख्यात थे संस्कृतविद्
इनके विश्वप्रसिद्ध शास्त्रीय ग्रन्थों के अतिरिक्त इनकी विश्व में व्यापक शिष्यपरम्परा है। प्रो शास्त्री ने पाणिनीय व्याकरण के स्थान पर जिस वाग्योग प्रविधि की स्थापना की है, उससे आकृष्ट हो कर विश्वजनीन जिज्ञासु चरणशरण ले रहे हैं। इसके अध्यापन के लिए उन्हें विदेशों में आमन्त्रित किया जाया करता था। इस विधि से प्रशिक्षित इनके शिष्य विदेशों में प्रोफेसर पदों पर अभिषिक्त है।

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